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गीता परिवार


राष्ट्र के प्रति समर्पित एवं बालक स्वरूप भगवान की पूजा में मग्न.. अखंड कार्यरत संगठन!  

भारत को एक परमवैभवशाली राष्ट्र एवं महाशक्ति बनाने के कार्य में बालकों को अत्यन्त महत्त्वपूर्ण भूमिका निभानी है। अत: परम    पूज्य स्वामी गोविंददेव गिरिजी (आचार्य श्री किशोरजी व्यास) एवं   स्व.श्री ओंकारनाथजी मालपाणी ने बालकों के सर्वांगीण विकास एवं उनमें सुसंस्कारों के बीजारोपण हेतु सन् 1986 में महाराष्ट्र के संगमनेर में गीता परिवार की स्थापना की।

गीता परिवार के अनगिनत निष्ठावान कार्यकर्ता इस महान् स्वप्न को साकार करने के लिए कार्य कर रहे हैं। गीता परिवार में संस्कार कार्य केवल श्लोक-स्तोत्र पाठ करने तक ही सीमित नहीं है। बालकों के शरीर, मन और बुध्दि के सम्पूर्ण विकास से उन्हें 'सम्यक् आकार' अर्थात संस्कार देने का कार्य शहरों व गाँवों में स्थित सैकड़ों केंद्रों में चल रहा है।

स्वामी गोविन्ददेव गिरिजी द्वारा दिये गये पंचसूत्र-भगवद्भक्ति, भगवद्गीता, भारतमाता, विज्ञानदृष्टि, स्वामी विवेकानंद - गीता परिवार के कार्य का आधार है। इसी ध्येय को समर्पित गीता परिवार के हजारों कार्यकर्ता बालक स्वरूप परमेश्वर की पूजा में लीन हैं। संगमनेर से प्रवाहित यह संस्कार गंगा आज आसेतु-हिमाचल सारे देश में गतिमान है।